जितिया व्रत: माताओं का संकल्प और संतानों के लिए आशीर्वाद- हर्षित आर्यन

 जितिया व्रत या जीवित्पुत्रिका व्रत एक महत्वपूर्ण हिंदू पर्व है, जिसमें माताएं अपने संतान की लंबी उम्र, कल्याण और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं। यह व्रत विशेष रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्रों और नेपाल के थारु व मैथिली समुदायों में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। बिक्रम संवत के आश्विन माह में कृष्ण पक्ष के सातवें से नौवें चंद्र दिवस तक तीन दिनों तक चलने वाला यह पर्व माताओं के लिए विशेष रूप से समर्पित होता है।

व्रत की तिथि एवं शुभ मुहूर्त

इस वर्ष, जितिया व्रत 25 सितंबर 2024, बुधवार को मनाया जाएगा। अष्टमी तिथि 24 सितंबर 2024 को दोपहर 12:38 बजे प्रारंभ होगी और 25 सितंबर 2024 को दोपहर 12:10 बजे समाप्त होगी।

व्रत के दिन बनने वाले कुछ प्रमुख शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं:

  • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:35 से सुबह 05:22 तक
  • अमृत काल: दोपहर 12:11 से 01:49 बजे तक
  • विजय मुहूर्त: दोपहर 02:12 से 03:00 बजे तक
  • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:13 से 06:37 बजे तक

व्रत पूजन का समय भी चौघड़िया मुहूर्त के अनुसार 25 सितंबर 2024 को शाम 04:43 से शाम 06:13 तक रहेगा। इन सभी शुभ मुहूर्तों में व्रत का विशेष महत्व होता है, जिससे संतान की रक्षा और सुखमय जीवन की कामना की जाती है।

व्रत की परंपरा

जितिया व्रत की परंपरा नहाय-खाय से शुरू होती है। इस दिन माताएं स्नान करके पवित्र होकर भोजन ग्रहण करती हैं। दूसरे दिन, खुर जितिया नामक निर्जला व्रत रखा जाता है, जिसमें माताएं न तो पानी पीती हैं, न ही भोजन करती हैं। इस व्रत में रात को भी सोने की मनाही होती है। तीसरे दिन पारण के साथ व्रत का समापन होता है, जिसमें माताएं विशेष पकवान जैसे भोर (करी और सफेद चावल), नोनी का साग और मडुआ की रोटी बनाकर ग्रहण करती हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी क्षेत्र में, तोरी की सब्जी और मारुवा की रोटी भी विशेष रूप से बनती है।

जितिया व्रत कथा

जितिया व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, जीमूतवाहन नामक गंधर्व राजा ने एक वृद्धा नागमाता की सहायता के लिए अपने जीवन का बलिदान देने का निर्णय लिया। वह गरुड़ द्वारा नागवंशियों को खाए जाने की परंपरा को समाप्त करना चाहता था। जीमूतवाहन की साहसिकता और बलिदान से प्रभावित होकर गरुड़ ने नागवंशियों को न खाने का संकल्प लिया। यह कहानी मातृत्व और त्याग की महत्ता को दर्शाती है, और इसी कारण से इस व्रत को संतान की भलाई और लंबी उम्र के लिए मनाया जाता है।

व्रत का महत्व

भविष्य पुराण में उल्लेखित है कि जितिया व्रत करने वाली माताओं की संतान का जीवन संकटों से सुरक्षित रहता है। भगवान शिव ने माता पार्वती को बताया था कि इस व्रत को विधिपूर्वक करने वाली माताओं की संतान पर कोई विपत्ति नहीं आती और उनके जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। यह पर्व मातृत्व के बलिदान, प्रेम और देखभाल का प्रतीक है, जो हिंदू धर्म की नैतिकता और संस्कारों को भी प्रतिबिंबित करता है।

स्वास्थ्य परामर्श

निर्जला व्रत करना शारीरिक और मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है, खासकर जब माताएं तीन दिन लगातार उपवास करती हैं। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि इस व्रत को करते समय कुछ स्वास्थ्य परामर्शों का पालन किया जाए:

  1. व्रत से पहले का भोजन: नहाय-खाय के दिन पौष्टिक भोजन करना आवश्यक है। दाल, चावल, हरी सब्जियां और दूध का सेवन करें ताकि शरीर को ऊर्जा प्राप्त हो सके।

  2. हाइड्रेशन: व्रत के पहले दिन अधिक से अधिक पानी पीकर शरीर को हाइड्रेट रखें ताकि निर्जला व्रत के दौरान शरीर में पानी की कमी न हो।

  3. आराम: चूंकि व्रत के दौरान सोने की मनाही है, इसलिए माताओं को पहले दिन पूरी तरह से आराम करना चाहिए ताकि वे व्रत के दौरान थकावट महसूस न करें।

  4. पारण के बाद: जब व्रत समाप्त हो जाए, तो तुरंत भारी भोजन न करें। पहले हल्के भोजन से शुरुआत करें, जैसे फल, दही या नींबू पानी। यह शरीर को धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लाने में मदद करता है।

  5. अगर स्वास्थ्य कमजोर हो: जिन माताओं को उच्च रक्तचाप, मधुमेह या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हैं, वे डॉक्टर से परामर्श लेकर व्रत करें। शरीर को हानि पहुँचाए बिना व्रत का पालन भी संभव है।

नैतिकता और मातृत्व का संदेश

जितिया व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मातृत्व के बलिदान और समर्पण की अद्भुत मिसाल भी है। भारतीय त्यौहारों की खूबसूरती उनकी नैतिकता और गहरे मूल्यबोध में होती है। जितिया व्रत यह संदेश देता है कि एक माँ अपने बच्चों की भलाई के लिए किसी भी हद तक जा सकती है, चाहे वह खुद को असुविधा में डालने की बात ही क्यों न हो। इस व्रत में माताओं का त्याग और प्रेम साफ झलकता है, और यह भावनात्मक रूप से अत्यंत प्रेरणादायक है।

इस तरह के पर्वों से यह स्पष्ट होता है कि हिंदू त्यौहार केवल धार्मिक रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनमें गहरे नैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्य छिपे होते हैं। जितिया व्रत एक माँ के निस्वार्थ प्रेम और उसकी संतान के प्रति असीमित समर्पण का प्रतीक है।

-हर्षित आर्यन

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